बंद खदानों में ज़िंदा दफन हो रहा कानून

एमसीबी/चिरमिरी,SECL की बंद पड़ी खदानें अब सिर्फ लोहे-पत्थर का ढांचा नहीं रहीं, बल्कि वे कानून, प्रशासन और सुशासन के दावों की कब्रगाह बन चुकी हैं। चिरमिरी क्षेत्र की वेस्ट सहित कई बंद खदानों में इन दिनों अवैध कोयला खनन खुलेआम जारी है। यह कोई छिपा हुआ खेल नहीं, बल्कि ऐसा संगठित अपराध है जो बिना राजनीतिक संरक्षण और प्रशासनिक मिलीभगत के संभव ही नहीं।
मजदूर नहीं, “जिंदा हथियार” बनाकर खदानों में उतारे जा रहे
सूत्रों से मिली पुख्ता जानकारी के अनुसार कोल माफिया गरीब और मजबूर मजदूरों को पैसों का लालच देकर उन बंद खदानों में उतार रहे हैं, जहां न वेंटिलेशन है, न सुरक्षा, न कोई जिम्मेदार। हर बार मजदूर जब नीचे उतरता है, वह अपनी जान दांव पर लगाता है, जबकि माफिया ऊपर खड़े होकर मुनाफे की गिनती करता है।
यह महज़ अवैध खनन नहीं, बल्कि सुनियोजित मानव-जीवन से खिलवाड़ है।
पोड़ी–चिरमिरी थाना क्षेत्र: अपराध का खुला ज़ोन
पोड़ी और चिरमिरी थाना क्षेत्रों में रात होते ही खदानों के आसपास गतिविधियां तेज़ हो जाती हैं। पहले बोरियों के ज़रिए कोयला ऊपर निकाला जाता है, फिर छोटे पिकअप वाहनों से इसे बड़े ट्रकों तक पहुंचाया जाता है। इसके बाद यह अवैध कोयला बिलासपुर और रायपुर की बड़ी मंडियों तक बेधड़क भेजा जाता है।
सबसे बड़ा सवाल यही है..
जब यह कोयला जिला, संभाग और राज्य की सीमाएं पार करता है, तो क्या पुलिस और प्रशासन अंधे हो जाते हैं?
छोटे चोर पकड़े जाते हैं, बड़े माफिया सम्मानित रहते हैं
स्थानीय लोगों का आरोप है कि कार्रवाई सिर्फ नाम मात्र की होती है। कभी-कभार साइकिल या ठेले पर कोयला ले जाने वालों को पकड़कर प्रशासन अपनी पीठ थपथपा लेता है, लेकिन असली खिलाड़ी — ट्रक, गोदाम, मंडी और नेटवर्क — सब सुरक्षित रहते हैं।
क्या यह कार्रवाई नहीं, बल्कि कोरम पूरा करने का नाटक है?
SECL: अपराध की पहली जिम्मेदार
जानकारों का कहना है कि यदि SECL प्रबंधन अपनी जिम्मेदारी निभाता, तो हालात यहां तक नहीं पहुंचते। बंद खदानों में मिट्टी-रेत की भराई और मोटी कंक्रीट दीवारों से स्थायी सीलिंग अनिवार्य थी। लेकिन वर्षों से SECL की लापरवाही ने इन खदानों को माफियाओं के हवाले कर दिया।
यह सवाल सीधा है —
यदि कल कोई मजदूर खदान में दबकर मरता है, तो क्या उसकी मौत की जिम्मेदारी SECL लेगा?
सत्ताधारी संरक्षण के आरोप, इसलिए कार्रवाई ठप?
सूत्रों का दावा है कि सत्ताधारी पार्टी से जुड़े कुछ प्रभावशाली लोग इस अवैध कारोबार में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हुए हैं। यही वजह बताई जा रही है कि न तो बड़ी छापेमारी होती है, न नेटवर्क तोड़ा जाता है।
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की सरकार जहां एक ओर सुशासन और भ्रष्टाचार-मुक्त प्रदेश के दावे कर रही है, वहीं दूसरी ओर उन्हीं दावों के साये में यह काला कारोबार फल-फूल रहा है।
बड़े हादसे का इंतज़ार?
खनन विशेषज्ञों और स्थानीय नागरिकों का साफ कहना है कि यदि हालात ऐसे ही रहे, तो किसी दिन बड़ी दुर्घटना तय है। सवाल यह है कि क्या प्रशासन किसी मजदूर की मौत के बाद जागेगा? क्या तब फिर जांच समिति, मुआवजा और आश्वासन दिए जाएंगे?
अब सवाल, सिर्फ खबर नहीं
बंद खदानें अब तक पूरी तरह सील क्यों नहीं की गईं?
अवैध कोयला ट्रक-ट्रक भरकर मंडियों तक कैसे पहुंच रहा है?
किन अधिकारियों और नेताओं के संरक्षण में यह नेटवर्क चल रहा है?
क्या प्रशासन कार्रवाई से पहले किसी बड़ी लाश का इंतज़ार कर रहा है?
चिरमिरी की बंद खदानें आज सिर्फ जमीन के नीचे नहीं, बल्कि सिस्टम के भीतर भी धंसी हुई सच्चाई को उजागर कर रही हैं।
