
नसरीन अशरफी की कलम से
मनेंद्रगढ़–चिरमिरी–भरतपुर (एमसीबी)।
नए जिले के रूप में पहचान मिलने के बाद मनेंद्रगढ़–चिरमिरी–भरतपुर (एमसीबी) में विकास और उम्मीदों के कई दीप जले। प्रशासनिक विस्तार, नई योजनाएं और बेहतर भविष्य के दावे—सबने मिलकर सपनों का एक उजला आकाश रचा। लेकिन इस चमक के पीछे खदानों की बस्तियों और श्रमिक मोहल्लों से उठती एक टीस आज भी हवा में तैरती है—
“अगर बच्चे स्कूल जाएंगे, तो रात को चूल्हा कैसे जलेगा?”
यह सवाल केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि उन असंख्य परिवारों की विवशता है जिनके लिए शिक्षा आज भी एक विलासिता है और दो वक्त की रोटी सबसे बड़ा संघर्ष।
बचपन पर भारी श्रम का बोझ
सुबह की किरण जहां स्कूलों में प्रार्थना और पाठ की शुरुआत का संकेत देती है, वहीं जिले के कई इलाकों में दिन तगाड़ी और फावड़े की आवाज से शुरू होता है। नन्हे हाथ, जिन्हें किताब और पेंसिल थामनी चाहिए, वे पत्थर तोड़ते और मिट्टी ढोते नजर आते हैं। चेहरे पर मासूमियत है, पर आंखों में जिम्मेदारियों का असमय बोझ।
सरकारी स्कूलों में मध्याह्न भोजन योजना बच्चों को आकर्षित अवश्य करती है, किंतु शाम को खाली बर्तन और भूखे परिवार की चिंता उन्हें फिर मजदूरी की राह पर लौटा देती है। पढ़ाई और पेट की इस जंग में अक्सर भूख जीत जाती है और बचपन हार जाता है।
एक 12 वर्षीय बालक की मासूम आवाज दिल को चीर देती है—
“स्कूल अच्छा लगता है, लेकिन मां अकेली कैसे कमाएगी? घर में छोटे भाई-बहन हैं।”
मजबूरी की बेड़ियों में जकड़ी नारी शक्ति
यह त्रासदी केवल बच्चों तक सीमित नहीं। घर की महिलाएं भी जीवन की कठोर तपिश में दिनभर श्रम करती हैं। ईंट-भट्ठों, निर्माण स्थलों और खदानों में वे शिशु को आंचल में सुलाकर पसीना बहाती हैं। उनके हाथों की लकीरों में सपनों से अधिक संघर्ष अंकित हैं।
महिला सशक्तिकरण के नारों और योजनाओं की घोषणाएं उनके जीवन में अब भी दूर की प्रतिध्वनि भर हैं। उनके लिए सशक्तिकरण का अर्थ है—रात को बच्चों की थाली में सूखी रोटी और नमक का इंतजाम हो जाना।
एक दिहाड़ी मजदूर महिला की आंखों से झरते शब्द आज भी गूंजते हैं—
“साहब, सवाल भूख का है… स्कूल की वर्दी से पेट नहीं भरता।”
योजनाएं और यथार्थ के बीच की खाई
शासन की अनेक योजनाएं कागजों पर सक्रिय हैं—स्वरोजगार, महिला समूह, पोषण अभियान और शिक्षा कार्यक्रम। प्रयास सराहनीय हैं, पर जमीनी सच्चाई यह है कि आर्थिक असुरक्षा का दुष्चक्र अभी टूटा नहीं है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि जब तक परिवारों की आय के स्थायी और सम्मानजनक साधन विकसित नहीं होंगे, तब तक शिक्षा की अलख इन बस्तियों तक पूरी तरह नहीं पहुंचेगी। बच्चे तभी स्कूल की ओर लौटेंगे, जब घर में रोटी की चिंता कम होगी।
समाधान की दिशा
एमसीबी के उज्ज्वल भविष्य के लिए केवल अधोसंरचना के नए भवन पर्याप्त नहीं। आवश्यकता है समग्र आर्थिक सशक्तिकरण की—स्थायी रोजगार, कौशल विकास, महिला स्वयं सहायता समूहों की मजबूती और बाल श्रम के विरुद्ध प्रभावी अभियान।
यदि इन परिवारों को सम्मानजनक आय और स्थायित्व का संबल मिलेगा, तभी बचपन फिर से मुस्कुराएगा। तभी नन्हे हाथों में फावड़े की जगह कलम होगी और खदानों की धूल के बीच भी सपनों का सूरज उगेगा।
आज एमसीबी के विकास की असली परीक्षा यही है—क्या हम पेट की आग में झुलसते बचपन को फिर से किताबों की रोशनी लौटा पाएंगे?
