25 Jun 2026, Thu

खबर का हुआ असर या फिर केवल कागजी कार्रवाई? संलग्न कर्मचारियों की वापसी के आदेश के बाद भी नहीं दिख रहा पालन

बैकुण्ठपुर। शिक्षा विभाग के कर्मचारियों के कथित संलग्नीकरण (अटैचमेंट) का मामला एक बार फिर चर्चा में है। लगातार प्रकाशित समाचारों, जनदर्शन शिकायतों और विभिन्न स्तरों पर उठाए गए सवालों के बाद जिला शिक्षा अधिकारी कोरिया द्वारा आदेश क्रमांक 3033/स्था./2026-27 दिनांक 24 जून 2026 जारी कर तहसील कार्यालय बैकुण्ठपुर, सोनहत एवं पटना में कार्यरत शिक्षा विभाग के कर्मचारियों को उनके मूल पदस्थापना स्थल पर वापस भेजने के निर्देश दिए गए थे। लेकिन अब जानकारी सामने आ रही है कि आदेश जारी होने के बाद भी कई कर्मचारी संबंधित तहसील कार्यालयों में कार्यरत हैं, जिससे आदेश के पालन पर प्रश्नचिह्न लग गया है।
जानकारी के अनुसार, यह मामला नया नहीं है। इससे पहले भी 07 अप्रैल 2026 को कलेक्टर कोरिया द्वारा संलग्नीकरण समाप्त करने संबंधी निर्देश दिए गए थे। आरोप है कि लंबे समय तक इन निर्देशों का प्रभावी पालन नहीं हुआ। इसके बाद जब पुनः शिकायतें की गईं तो शिक्षा विभाग की ओर से यह जानकारी दी गई कि विभाग का कोई भी कर्मचारी संलग्न नहीं है।
हालांकि बाद में ऐसे दस्तावेज सामने आए जिनमें संबंधित विद्यालयों के प्राचार्यों ने पत्र लिखकर अपने कर्मचारियों को मूल संस्था में वापस भेजने की मांग की थी। प्राचार्यों का कहना था कि विद्यालयों में स्टाफ की कमी के कारण शैक्षणिक कार्य प्रभावित हो रहा है और संलग्न कर्मचारियों की आवश्यकता विद्यालयों में है।
मामले ने उस समय नया मोड़ ले लिया जब जनदर्शन शिकायत क्रमांक 2010226000922 दिनांक 16 जून 2026 के संदर्भ में जिला शिक्षा अधिकारी ने स्वयं पत्र क्रमांक 3033/स्था./2026-27 जारी कर तहसीलदारों को कर्मचारियों को मूल पदस्थापना संस्था हेतु कार्यमुक्त करने के निर्देश दिए। इस आदेश के बाद यह सवाल उठने लगा कि यदि कोई कर्मचारी संलग्न नहीं था, जैसा पहले बताया गया था, तो फिर उन्हें वापस भेजने का आदेश क्यों जारी करना पड़ा। इससे विभाग द्वारा पूर्व में दी गई जानकारी की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।
अब चर्चा इस बात की है कि जिला शिक्षा अधिकारी का आदेश जारी होने के बाद भी उसका पूर्ण पालन नहीं हो रहा है। स्थानीय स्तर पर मिल रही जानकारी के अनुसार कुछ कर्मचारी अब भी तहसील पटना, सोनहत एवं बैकुण्ठपुर कार्यालयों में कार्य कर रहे हैं। यदि यह स्थिति सही है तो यह केवल आदेश जारी करने और उसके पालन के बीच के अंतर को उजागर करती है।
संलग्न कर्मचारियों को तहसील कार्यालयों में बनाए रखने का कारण जनगणना कार्य बताया जा रहा है। लेकिन सूत्रों का दावा है कि कुछ कर्मचारियों से जनगणना संबंधी कार्य के बजाय वाचक अथवा अन्य कार्यालयीन कार्य कराए जा रहे हैं। यदि ऐसा है तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि कर्मचारियों को शिक्षा कार्य से अलग रखकर अन्य कार्यों में लगाए जाने का औचित्य क्या है।
पूरे मामले ने प्रशासनिक कार्यप्रणाली को लेकर भी बहस छेड़ दी है। जब विभागीय अभिलेखों में एक ओर कर्मचारियों के संलग्न नहीं होने की बात कही जाए और दूसरी ओर उन्हीं कर्मचारियों को वापस भेजने के लिए आदेश जारी करना पड़े, तो आम नागरिकों के मन में संदेह उत्पन्न होना स्वाभाविक है। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि यदि सरकारी अधिकारी और कर्मचारी ही लिखित रूप से विरोधाभासी जानकारी दें, तो आम जनता अपनी शिकायतों के निष्पक्ष निराकरण की उम्मीद कैसे करे।
गौरतलब है कि कलेक्टर कोरिया रोक्तिमा यादव कई बार अधिकारियों को स्पष्ट संदेश दे चुकी हैं कि प्रशासन केवल आश्वासन नहीं बल्कि परिणाम दिखाए। उनका चर्चित कथन—“काम हो जाएगा नहीं, काम हो गया है सुनना चाहती हूं”—आज भी प्रशासनिक बैठकों में उद्धृत किया जाता है।
ऐसे में अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि जिला शिक्षा अधिकारी के आदेश का वास्तविक पालन कब तक होता है और संलग्नीकरण का यह विवाद वास्तव में समाप्त होता है या फिर यह मामला केवल आदेशों और पत्राचार तक ही सीमित रह जाएगा।

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