(आशिक खान सूरजपुर) उल्लेखनीय है कि आदिवासी पंडो जनजाति समाज आज समूचा सम्भाग में खाना बदोश की तरह गुजर बसर कर रहे हैं किंतु इनका सुध लेने वाला कोई भी नही है,न तो पंचायतो के पदाधिकारी कभी सुनते न ही जिला प्रसाशन इनके लिए कोई ठोस कदम उठा पा रहा है।।
अगर इनकी जमीन घर की बात करें तो आज भी जिस जमीन पर कब्जा कर झोपड़ी बनाकर रह रहे हैं उस भूमि का पट्टा तक नही बन पाया,इंद्राआवास से लेकर प्रधानमंत्री आवास की स्वीकृति के बाद भी पंडो समाज घर के लिए मोहताज हैं,आज भी इन्हें उसी प्लास्टिक और लकड़ी से घिरे हुए झुग्गियों में रहकर जीवन यापन करना पड़ रहा है,,यदि हम बात करें इनके शिक्षा की तो इनके बस्तियों में प्राइमरी तक स्कूल खोले गए लेकिन स्कूलों में बच्चो की संख्या 5 के 10बच्चे ही देखे जाते है,,यही नही महीना में ऐसे स्कूल के टीचर मनमानी तरीके से आना जाना करते हैं,,
स्वास्थ्य की अगर बात करें तो शायद ही 3,से 5 लोग अस्पताल से ईलाज के लिए या प्रस्तुति के लिए इन्हें प्रेरित किया जाता है,,यहां की महिलाएं और पुरुच आज भी बमुश्किल से पेट पालकर जीने को मजबूर है,,बहरहाल यह कहना मुनासिब होगा कि बड़े बड़े दवा करने वाले सिस्टम और सरकार इन दत्तकपुत्रों की कोई खबर कभी नही लेता है।।
एक भी पंडो परिवारों को उज्जवला योजना का लाभ मिला है ,कई महिलाओं के पति की अकाल मौत या आकास्मिक मौत पर कोई सहायता राशि नही मिल पाता न ही इन्हें को शाशन की योजनाओं के बारे में बताता है,,हमारे सहमत न्यूज की टीम ने अपने पड़ताल में यह पाया कि जिन्हें आदिवासी का दर्जा तो दिया गया साथ ही रास्ट्रपति के दत्तकपुत्रों की सूची में आने के बाद अगर कोई 10वी 12 तक पड़ लिया तो सरकार और जिला प्रसाशन को ऐसे लाचार लोगो को भृत्य जैसे नोकरी में नियुक्त करना चाहिये,, एक दशक पहले जिले ओर सम्भाग में ऐसा मुहिम चलाकर कुछ पढ़े लिखे पंडो परिवार के बच्चो को जगह दिया गया था किंतु उसके बाद से समूचा सुराजपुर जिले के लगभग आधा दर्जन विकासखण्ड में लगभग 10 से 12 हजार पंडो परिवार निवासरत है जिसमे कई ऐसे है जिनका राशन कार्ड तक नही है,,वोटर लिस्ट में नाम नही है,आधार कार्ड नही है,,जनधन खाता नही खोला गया है,ये समाज आज भी खाना बदोश की तरह कन्दमूल और वनोपज के भरोशे जीवन यापन कर रहे है,पंडो अभिकरण योजना शुरू होने से पंडो समाज कुछ प्रगति में थे लेकिन योजना बन्द होते ही इनका विकास अधर में लटक गया है।।
ज्ञात हो कि कई समाज सेवी संस्था आज पंडो जनजाति को शिक्षा और स्वास्थ्य के अलावा अन्य सुविधाओं के लिए पंजीकृत हैं किंतु धरातल पर जोरो बटा सन्नाटा है,,फर्जी बिलिंग कर करोड़ो रूपये का गोलमाल प्रतिवर्ष किया जा रहा है परंतु इन सब की जांच कभी होती नही है इसका मुख्य कारण है कि पंडो समाज का शोषण इसलिए किया जा रहा है कि वे बेचारे अनपढ़ हैं उन्हें योजना की जानकारी नही है न ही कोई बताने वाला सरकारी तंत्र पहुचता है।।
पंडो जनजाति आज भी लकड़ी ,कन्द मूल,ओर छोटी छोटी मजदूरी कर जीवन जीने को मजबूर ताज्जुब यह है कि मनरेगा कार्य के लिए जाबकार्ड नही बनाया गया न ही तेंदूपत्ता संग्रहन में इनका कार्ड नही बनाया गया है,,कुल मिलाकर इस आधुनिक युग मे आज भी पंडो समाज काफी नीचे पहुँच गया है,,न रहने को घर न सोने को बिस्तर,न जमीन,न शिक्षा न स्वास्थ्य जैसे महत्वपूर्ण लाभ से कोशो दूर पंडो आदिवासी समाज राज्य सरकार व जिला प्रसासन का ध्यान आकर्षित कराते हुए खबर पर संज्ञान लेने की आवश्कयता है जिससे पंडो जनजातियों को न्याय मिल सके।।।
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