24 Jun 2026, Wed

अयोध्या फैसले में SC ने समझाया भगवान का अर्थ

नई दिल्लीभगवान यानी सुप्रीम (सर्वशक्तिमान) सभी जगह मौजूद हैं और उनकी कोई सीमा नहीं है। लोग जिस मूर्ति की पूजा करते हैं वह भगवान का प्रतिनिधित्व करता है और वह न्यायिक व्यक्तित्व माना जाता है। ने अयोध्या मामले में दिए फैसले में मूर्ति के न्यायिक व्यक्तित्व के बारे में विस्तार से व्याख्या की है। अदालत ने कहा है कि हिंदू मान्यता के मुताबिक सर्वशक्तिमान या भगवान का भौतिक रूप या पहचान मूर्ति के रूप में है और मूर्ति सर्वशक्तिमान (सुप्रीम) का प्रतिनिधित्व करता है और मूर्ति ही सर्वशक्तिमान की पहचान है जो न्यायिक व्यक्तित्व है।

भगवान अनंत हैं और सीमाओं में परिभाषित नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या मामले में दिए अपने फैसले में कहा है कि गॉड यानी सुप्रीम (सर्वशक्तिमान) जूरिस्ट पर्सन (न्यायिक व्यक्तित्व) नहीं है। भगवान मानकर जिस मूर्ति की लोग पूजा करते हैं वह न्यायिक व्यक्तित्व माना जाता है।

मूर्ति भगवान का मौतिक रूप
मूर्ति की पहचान सुनिश्चित है। अपने फैसले में अदालत ने लिखा है कि मूर्ति भगवान का भौतिक रूप है और इसी कारण वह न्यायिक व्यक्तित्व है। हिंदुत्व में भगवान भौतिक रूप में रहते हैं और वह मूर्ति के रूप में होते हैं और मूर्ति की पूजा होती है। हिंदू परंपरा के मुताबिक मंदिर की संपत्ति होती है और मूर्ति का उस संपत्ति पर अधिकार होता है क्योंकि वह न्यायिक व्यक्तित्व है। मूर्ति की ओर से अदालत में वाद दायर होता है और उसे न्यायिक व्यक्तित्व के तौर पर मान्यता है।

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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यहां मामला भगवान श्री राम लला विराजमान और स्थान श्री राम जन्मभूमि के संदर्भ में है और दोनों को न्यायिक व्यक्तित्व का दावा किया गया है। भारतीय कोर्ट पहले इस बात की व्यवस्था दे चुका है कि मूर्ति न्यायिक व्यक्ति है।

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न्यायिक व्यक्ति में हित, अधिकार और कर्तव्य निहित
अदालत ने कहा कि न्यायिक व्यक्तित्व में हित, अधिकार और कर्तव्य निहित होता है। लीगल व्यक्तित्व को लगातार कानून में मान्यता है। प्राकृतिक व्यक्ति में ये सब होता है लेकिन कृत्रिम कानूनी व्यक्तित्व भी लीगल पर्सन है। कानून इसके अधिकार और ड्यूटी की व्याख्या करता है। कॉरपोरेशन में कृत्रिम कानूनी व्यक्तित्व को व्यापक तौर पर मान्यता है। कंपनी लॉ इसकी व्याख्या करता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हिंदुत्व में देवी देवताओं की मूर्ति की पूजा होती है और सर्वशक्तिमान को मूर्ति का रूप दिया गया है जिससे उनकी पहचान सुनिश्चित होती है।

सर्वशक्तिमान में कानूनी व्यक्तित्व प्रदत्त नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने पहले राम जानकी जी देवता बनाम स्टेट ऑफ बिहार केस में कहा था कि ईश्वर सर्वशक्तिमान और सर्वज्ञ हैं और उनकी उपस्थिति महसूस की जाती है। किसी विशेष रूप या छवि के कारण नहीं बल्कि वह सर्वशक्तिमान हैं। वह निराकार हैं। हिंदुत्व कहता है कि जो सर्वशक्तिमान भगवान है वह हर जगह ब्रह्मांड में मौजूद हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सर्वशक्तिमान में कानूनी व्यक्तित्व प्रदत्त नहीं है क्योंकि सर्वशक्तिमान का कोई भौतिक उपस्थिति नहीं है वो सर्वव्यापी हैं और यही आधार है कि वह कानूनी व्यक्ति नहीं हैं। कोई देवत्व में कानूनी व्यक्तित्व प्रदत्त नहीं करता।

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हिंदुत्व में देवता, भगवान या सर्वशक्तिमान अनंत हैं। हिंदुत्व की मान्यता के मुताबिक देवता ब्रह्मांड के हर कण में मौजूद हैं। देवता व भगवान की व्याख्या किसी सीमा में नहीं हो सकती है। इसी कारण जो सर्वव्यापी हैं उनके बारे में ये तय करना असंभव है कि उनकी शुरुआत कहां से है और उनका अंत या सीमा क्या है और वह न्यायिक व्यक्ति नहीं हैं। लेकिन हिंदुत्व में सर्वशक्तिमान का भौतिक प्रदर्शन या उनकी पहचान मूर्ति में होती है। और भक्त मूर्ति में उनके वजूद होने के कारण उनकी पूजा करते हैं। एक मूर्ति सर्वशक्तिमान का प्रतिनिधित्व करता है और मूर्ति ही सर्वशक्तिमान की पहचान है और मूर्ति के जरिये ही पहचाने योग्य बनते हैं।

संपत्ति विवाद बड़ा सवाल था
हिंदू परंपरा के मुताबिक मंदिरों की संपत्ति होती रही है और संपत्ति मूर्ति को दिया जाता रहा है। 19वीं सदी के अंत में कोर्ट में पहला मामला आया था कि क्या हिंदू मूर्ति अलग कानूनी व्यक्तित्व है। अंग्रेज जज ने हिंदू कानून और परंपरा के आधार पर इसकी व्याख्या की और माना कि वह कानूनी व्यक्ति है। दरअसल संपत्ति विवाद बड़ा सवाल था। जहां पूजा होती थी वहां संपत्ति का सवाल था। फिर इस दौरान शेबियत (मंदिर के मैनेजमेंट) का भी मामला था। शेबियत पूजा पाठ करते थे और मंदिर की देखरेख करते थे। मंदिर को जमीन जायदाद दी जाती थी ताकि धार्मिक अनुष्ठान में उस संपत्ति का उपयोग किया जाए। जब असल जमीन के मालिक नहीं रहे और शेबियत जमीन का मालिकाना हक नहीं रखता था तब ये सवाल उठा था कि मंदिर की संपत्ति किसमें निहित होगा। इसके लिए कोर्ट ने सिद्धांत प्रतिपादित किया और तय किया कि संपत्ति का दावा किसका होगा और फिर कोर्ट ने तय किया कि मूर्ति कानूनी व्यक्तित्व होगा और सारी संपत्ति उनमें निहित होगा।

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मालिकाना हक तय करने के कारण कानूनी व्यक्तित्व का उद्भव
ऐतिहासिक परिस्थितियों के मद्देनजर ये एक कानूनी आविष्कार था। और इस तरह से मूर्ति को कानूनी व्यक्तित्व का दर्जा मिला है। यानी अलग कानूनी व्यक्तित्व की स्थापना संपत्ति के मालिकाना हक तय करने के कारण किया गया। इस तरह कानूनी व्यक्तित्व की मान्यता के कारण हिंदू प्रैक्टिस में मंदिर के चढ़ाने को कानूनी प्रभाव मिल पाया। इन तमाम व्याख्यान के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने तय किया कि राम लला विराजमान कानूनी व्यक्तित्व हैं।

Source: National

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