7 May 2026, Thu

ट्रंप ने ईरान को क्यों दी 52 इंतकाम की धमकी?

वॉशिंगटन
के राष्ट्रपति ने चेतावनी दी है कि यदि ईरान अमेरिकी जवानों या सम्पत्ति पर हमला करता है तो अमेरिका 52 ईरानी स्थलों को निशाना बनाएगा और उन पर ‘बहुत तेजी से और जोरदार हमला’ करेगा। सवाल यह है कि अमेरिका ने इन 52 ठिकानों को ही हमले कि लिए क्यों चुना है? ट्रंप ने अपने ट्वीट में कहा, ’52 अंक उन लोगों की संख्या को दर्शाता है, जिन्हें एक साल से अधिक समय तक तेहरान में अमेरिकी दूतावास में 1979 में बंधक बनाकर रखा गया था।’ ट्रंप ने यह भी कहा कि इनमें से कुछ स्थान ईरानी संस्कृति के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं।

एक अमेरिकी चैनल के इंटरव्यू में वाइट हाउस के सुरक्षा सलाहकार रॉबर्ट ओ ब्रायन ने कहा, ‘राष्ट्रपति ट्रंप स्पष्ट करना चाहते हैं कि जिस रास्ते पर ईरानी चल रहे हैं वह बहुत ही गलत है।’ उन्होंने कहा, ‘हम चाहते हैं कि मामला सुलझ जाए। अगर वे अमेरिका के खिलाफ जाएंगे तो इसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे।’ अमेरिका के एक पूर्व सुरक्षा अधिकारी ने लिखा, ‘मेरे लिए यह विश्वास करना कठिन है कि पेंटागन ट्रंप को उन जगहों के बारे में बताएगा जो ईरान की संस्कृति से जुड़े हुए हैं। किसी कल्चरल साइट पह हमला करना एक वॉर क्राइम है।’

आखिर 1979 में क्या हुआ था?
ट्रंप ने साल 1979 की जिस घटना का जिक्र किया, आखिर वह क्या थी। आइए जानते हैं पूरा घटनाक्रम-

1978– ईरान के आखिरी शाह मोहम्मद रजा पहलवी के खिलाफ क्रांति शुरू हो गई और जगह-जगह दंगे होने लगे।

16 जनवरी 1979– शाह पहलवी ईरान छोड़कर मिस्र भाग गए।

1 फरवरी 1979- 14 साल के निर्वासन के बाद अयातुल्लाह खमैनी ईरान का शासन चलाने के लिए वापस लौटे।

22 अक्टूबर 1979– मोहम्मद रजा पहलवी कैंसर के इलाज के लिए अमेरिका आए।

4 नवंबर 1979– ईरान के छात्रों ने तेहरान में अमेरिकी दूतावास के बाहर प्रदर्शन किया और फिर हमला करके 90 लोगों को बंधक बना लिया। इनमें 66 अमेरिकी शामिल थे। स्टूडेंट मांग कर रहे थे कि शाह पहलवी को ईरान भेजा जाए ताकि वे हिसाब चुकता कर सकें।

5 नवंबर 1979– ईरान सरकार ने अमेरिका से सैन्य समझौते रद्द कर दिए।

6 नवंबर 1979– पहले की सरकार गिर गई और अयातुल्लाह खमैनी ने सरकार बनाई। अब ईरान में रिवोलूशनरी काउंसिल की सरकार थी।

7 नवंबर 1979– अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने अटॉर्नी जनरल रामसे क्लार्क और सीनेट इंटेलिजेंस कमिटी स्टाफ के डायरेक्टर विलियम मिलर को ईरान भेजा ताकि बंधकों को छोड़ने के बारे में बात हो सके। अयातुल्लाह खोमैनी ने उनसे मिलने से इनकार कर दिया।

14 नवंबर 1979– राष्ट्रपति कार्टर ने अमेरिकी बैंकों में जमा ईरान की संपत्ति को फ्रीज कर दिया।

17 नवंबर 1979– खमैनी ने महिला और अफ्रीकन-अमेरिकन बंधकों को मुक्त करने का आदेश दिया। 19 और 20 नवंबर को उन्हें मुक्त किया गया। अब वहां 53 बंधक बचे हुए थे।

4 दिसंबर 1979- अमेरिका के सिक्यॉरिटी काउंसिल ने सभी बंधकों को मुक्त करने का प्रस्ताव पारित किया।

15 दिसंबर 1979- शाह पहलवी अमेरिका से पनामा चले गए।

28 जनवरी 1980– अमेरिकी दूतावास में काम करने वाले 6 अमेरिकी भागकर अमेरिका पहुंच गए। दरअसल वे हमले के समय एक कनाडाई दूतावास के अधिकारी के घर पर छिप गए थे। योजना बनाई गई कि कनाडा की सरकार से हाथ मिलाकर बंधकों को मुक्त कराया जा सकता है।

मार्च 1980 – शाह फिर वापस ईरान आ गए। बाद में वह फिर मिस्र चले गए।

7 अप्रैल1980– अमेरिकी राष्ट्रपति कार्टर ने ईरान के साथ सभी समझौते रद्द कर दिए और प्रतिबंध लगा दिए। उन्होंने ईरान के अधिकारियों को अमेरिका छोड़ने के आदेश दिया।

25 अप्रैल 1980– बंधकों को छुड़ाने का प्रयास करने वाला हेलिकॉप्टर क्रैश हो गया और इसमें 8 अमेरिकी मारे गए।

11 जुलाई 1980 – बीमारी की वजह से एक और बंधक को मुक्त कर दिया गया। अब वहां कुल 52 बंदी बचे थे।

27 जुलाई 1980– कैंसर की वजह से मिस्र में शाह पहलवी की मौत हो गई।

12 सितंबर 1980- अयातुल्लाह खोमैनी ने बंदियों को मुक्त करने के लिए नए नियम लगाए। इसमें शर्त लगाई गई कि अमेरिका ईरान की संपत्ति को अनफ्रीज करे।

19 जनवरी 1981– अमेरिका और ईरान ने बंधकों को मुक्त करने और ईरान की संपत्ति को अनफ्रीज करने के लिए समझौते पर हस्ताक्षर किए।

20 जनवरी 1981– बाकी बचे 52 बंधकों को मुक्त कर दिया गया और उन्होंने जर्मनी के लिए उड़ान भरी और वहां से वे अमेरीका पहुंचे।

कई देशों ने अमेरिका और ईरान से संयम बरतने का आग्रह किया
फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने अलग अलग तौर पर रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और तुर्की के राष्ट्रपति रिसेप तैय्यप एर्डोऑन के साथ फोन पर मध्य-पूर्व क्षेत्र की स्थिति पर बात की। तीनों नेताओं ने मध्य-पूर्व क्षेत्र की स्थिति पर चिंता जताई और विभिन्न पक्षों से संयम से काम लेने की अपील की। ब्रिटेन के विदेश दूत डोमिनिक राब ने विभिन्न पक्षों से अपील की कि सोलेमानी की मौत के बाद मुठभेड़ की स्थिति को शिथिल बनाएं।

उन्होंने कहा कि मुठभेड़ हमारे हित के अनुरूप नहीं है। सीरिया के विदेश मंत्रालय ने वक्तव्य जारी कर इराक और ईरान को संवेदना दी और अमेरिका की निंदा की। वक्तव्य में कहा गया है कि इराक की अस्थिरता का कारण अमेरिका है। इसके साथ साथ कतर और लेबनान के विदेश मंत्रालय ने भी वक्तव्य जारी कर विभिन्न पक्षों से संयम से काम लेने की अपील की, ताकि मध्य-पूर्व क्षेत्र की स्थिति न बिगड़े।

Source: International

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *